भक्ति और श्रद्धा से ही परमात्मा की प्राप्ति संभव : मारूतिनंदन शास्त्री

Marutinandan Pandit, Dharmik News
जयपुर। हाथी बाबू मार्ग, बनीपार्क स्थित श्रीराधा-दामोदर मंदिर में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा महोत्सव के तहत गुरुवार को पांचवे दिन श्रीकृष्ण बाल लीलाओं का वर्णन किया गया। श्रीधाम वृंदावन से पधारे परम पूज्य पं. मारूतिनंदन शास्त्री जी महाराज ने कहा कि कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार हैं। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। जब-जब इस पृथ्वी पर असुर एवं राक्षसों के पापों का आतंक व्याप्त होता है तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवतरित होकर पृथ्वी के भार को कम करते हैं। वैसे तो भगवान विष्णु ने अभी तक तेईस अवतारों को धारण किया। इन अवतारों में उनके सबसे महत्वपूर्ण अवतार श्रीराम और श्रीकृष्ण के ही माने जाते हैं। Pandit Marutinandan, Jaipur newsश्रीकृष्ण का जन्म क्षत्रिय कुल में राजा यदुकुल के वंश में हुआ था।
मारूतिनंदन शास्त्री ने श्रीकृष्ण जी के जीवन गाथा का विस्तारपूर्वक विवरण करते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लेते ही कर्म का चयन किया। नन्हें कृष्ण द्वारा जन्म के छठे दिन ही शकटासुर का वध कर दिया, सातवें दिन पूतना को मौत की नींद सुला दिया। तीन महीने के थे तो कान्हा ने व्योमासुर को मार गिराया। प्रभु ने बाल्यकाल में ही कालिया वध किया और सात वर्ष की आयु में गोवर्धन पर्वत को उठाकर इंद्र के अभिमान को चूर-चूर किया। गोकुल में गोचरण किया तथा गीता का उपदेश देकर हमें कर्मयोग का ज्ञान सिखाया। प्रत्येक व्यक्ति को कर्म के माध्यम से जीवन में अग्रसर रहना चाहिए।
कथावाचक शास्त्री जी ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और कंस वध का भजनों सहित विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म लेकर भी जो व्यक्तिपाप के अधीन होकर इस भागवत रूपी पुण्यदायिनी कथा को श्रवण नहीं करते तो उनका जीवन ही बेकार है और जिन लोगों ने इस कथा को सुनकर अपने जीवन में इसकी शिक्षाएं आत्मसात कर ली हैं तो मानों उन्होंने अपने पिता, माता और पत्नी तीनों के ही कुल का उद्धार कर लिया है। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने का साधन गौ सेवा है। श्रीकृष्ण ने गो को अपना अराध्य मानते हुए पूजा एवं सेवा की। याद रखो, गो सेवक कभी निर्धन नहीं होता।
मारूतिनंदन शास्त्री जी ने कहा कि कलयुग में केवल कृष्ण का नाम ही आधार है जो भवसागर से पार लगा सकता है। परमात्मा को केवल भक्ति और श्रद्धा से पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि परिवर्तन इस संसार का नियम है यह संसार परिवर्तनशील है, जिस प्रकार एक वृक्ष से पुराने पत्ते गिरने पर नए पत्तों का जन्म होता है, इसी प्रकार मनुष्य अपना पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करता है। कथा में गोर्वधन पूजा पर छपन भोग की आकर्षक मनमोहक झांकिया की प्रस्तुति काबिले तारीफ थी। कथा के यजमान बलराज मित्तल-श्रीमती सोनिया मित्तल, श्रीगंगानगर व अजय शर्मा-श्रीमती अनोखी शर्मा, जयपुर ने पूजन करवाया। महाप्रसाद के उपरांत कथा का समापन किया गया।

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