बीकानेर : जातीय संकीर्णता का देश में हावी होना राष्ट्र के लिए अशुभ : पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा

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बीकानेर। देश के जाने-माने हास्य कवि, पद्मश्री व ब्राह्मण समाज के वैश्विक संगठन विप्र फाउण्डेशन के संरक्षक सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि जातीय संकीर्णता जिस प्रकार देश में हावी हो रही है यह राष्ट्र के लिए अशुभ है। विप्र फाउण्डेशन इसका प्रतिवाद करता है। उन्होंने कहा कि हम समरस समाज की वकालत करते हैं, सभी जातियां साथ होंगी तभी देश का विकास होगा और भारत फिर से सोने की चिडिया बनेगा।

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शर्मा ने आज यहां संवाददाताअेां से कहा कि कवि सम्मेलन की उपयोगिता, प्रासंगिकता को सकारात्मक एवं वर्तमान दौर के लोगों के लिये मानसिक रूप से स्वस्थ मनोरंजन के बेहतर विकल्प के रूप में बताया। शर्मा ने कहा ब्राह्मण समाज का अंतरराष्ट्रीय स्तर का सबसे बड़ा संगठन विप्र फाउण्डेशन (विफा) राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता व स्वजातीय गतिशीलता के साथ विभिन्न उद्देश्यों को लेकर गतिमान है। विफा द्वारा ब्राह्मण समाज के युवाओं के लिए सफलतापूर्वक संचालित वैद्य पंडित रामनारायण शर्मा उच्च शिक्षा सहयोग योजना के अंतर्गत 31 जनवरी 2019 तक करीब 200 छात्रों को लाभान्वित किया जा चुका है, जिन्हें करीब सवा करोड रुपए की राशि उनके उच्च शिक्षा अध्ययन हेतु प्रदान की गई। इनमें 70 युवाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार भी प्राप्त कर लिया तथा ये अपना ऋण पुनः अदा कर रहे हैं।

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उन्होंने युवाओं के नाम अपने संदेश में कहा कि वे संदेश देने वाले लोगों से बचें युवाओं को अपना निर्णय स्वयं लेना चाहिए। यानी आज के होनहार युवाओं को किसी के संदेश को जानने या मानने की जरूरत नहीं है वे अपने आप में योग्य व सक्षम है।
शर्मा ने गत दिनों केंद्र की मोदी सरकार द्वारा सामान्य वर्ग को आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण बिल से संबंधित सवाल के जवाब में कहा कि निश्चित रूप से देश के समरस नागरिकों की वर्षों पुरानी मांग पूरी होने पर ब्राह्मण समाज में खुशी की लहर है। उन्होंने कहा समानता के पक्षधर विप्र समाज की अनेक संस्थाओं व कार्यकर्ताओं ने आर्थिक आधार पर आरक्षण की जो लंबी लड़ाई लड़ी यह उसी का परिणाम है। उन्होंने यह भी कहा कि विप्र फाउण्डेशन की तो मांग 15 फीसदी की थी यदि ऐसा होता तो गरीब, पिछड़े व योग्य लोगों को समुचित अवसर मिल पाते। हास्य कवि शर्मा ने यह भी कहा कि टीवी चैनल्स पर कवि सम्मेलन के रूप में दिखाए जाने वाले कार्यक्रमों में कविताएं नहीं होती। टीवी चैनल्स की टीआरपी कल्चर के कपड़े उतार कर बढ़ती है जबकि हमारी टीआरपी कल्चर के कपड़े पहनाकर बरकरार है अथवा बढ़ती भी है। उन्होंने कहा कि यदि कैबरे डांसर की लोकप्रियता है तो इसका मतलब यह नहीं कि शास्त्रीय संगीत की लोकप्रियता खत्म हो गई है। बच्चों में हिंदी के प्रति जागरूकता अर्थात भारतीय भाषाओं के लिए आंदोलन चलाने को भी उन्होंने जरूरत बताया। एक अन्य प्रश्न उत्तर में पद्मश्री सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि लोग आज कुंठा की आग में जल रहे हैं। किसी समय में जब लोगों के पास कार, एसी आदि अनेक सुख सुविधाओं के साधन नहीं होते थे तब पड़ोसियों के सुख से लोग सुखी होते थे, लेकिन आज सगा भाई ही अपने सगे भाई के सुख से ही दुखी है इसे विडंबना ही कहा जाएगा। हरियाणा प्रांत वर्ष 1945 में जन्मे सुरेंद्र शर्मा के अब तक अनेक व्यंग्य लेख संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। गत दिनों ही उन्हें दिल्ली सरकार द्वारा हिंदी अकादमी के नए उपाध्यक्ष पद पर भी मनोनीत किया गया है।

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