बच्चों में बदलाव की भूमिका निभाते स्कूल

जयपुर : जीवन की सबसे अच्छी अवधि बचपन की होती है और इसमें कोई शक नहीं है कि स्कूल के दिन किसी व्यक्ति के जीवन के स्वर्णयुग की तरह होते हैं। स्कूल बदलाव लाने वाली भूमिका निभाते हैं और ऐसी बुनियाद हैं जिस पर किसी का व्यक्तित्व, पहचान और चरित्र बनता है। कायदे से स्कूल की भूमिका प्रत्येक छात्र की शैक्षिक और बौद्धिक संभावनाओं को पूरी तरह निखारना होता है। पर दुर्भाग्य से ज्यादातर छात्र स्कूली दिनों में अपनी संभावनाओं को समझने में नाकाम रहते हैं और इसे जीवन में आगे चलकर समझते हैं। ।

बच्चों के लिए स्कूल कई तरह के मौके पेश कर सकते हैं। चूंकि बच्चे अपने दिन का बड़ा हिस्सा स्कूल में गुजारते हैं इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि शिक्षा मुहैया करने का काम इस तरह से डिजाइन किया जाए कि स्कूल में पढ़ने का अनुभव समृबच्चों में बदलाव की भूमिका निभाते स्कूल 1द्ध हो। इसमें ऐसी गतिविधियां शामिल हैं जो पाठ्यपुस्तकों और नोटबुक से बहुत आगे तक हैं। स्कूलों को चाहिए कि कम उम्र में ही बच्चों के लिए एक संयोजित रुख अपनाएं ताकि छात्रों के लिए एक सामूहिक इंपैक्ट मॉडल तैयार हो। इससे उनका बौद्धिक, निजी और सामाजिक विकास संभव हो। स्कूल अधिकारी कुछ ऐसे उपाय अपना सकते हैं और अपने स्कूलों को बेहतर उपकरणों से लैस करके सीखने ने मानकों को बेहतर कर सकते हैं। सबसे पहले तो स्कूलों में पढ़ाई के अनुभव तो बेहतर करने के लिए स्कूल टेक्नॉलॉजी को अपनाना शुरू कर सकते हैं ताकि पढ़ाई को एक नए स्तर पर ले जाया जा सके जहां छात्र संबंध जोड़ सकें,कनेक्ट कर सके और प्रेरित हो सकें। इस तरह की अभिनव अवधारणाओं को अमेरिका में आम बोलचाल में फ्लिप्ड क्लासरूम्स कहा जाता है।

ये युवा मस्तिष्क को रचनात्मक ढंग से सोचने की चुनौती देते हैं और छात्रों के जुड़ाव का स्तर बढ़ा देते हैं। शिक्षण का यह तरीका सीखने की योग्यता से संबंधित मुद्दों का ख्याल रखता है और डिजिटल स्क्रीन के जरिए बताना संभव करता है और इसके साथ निर्देश देने की कई स्टाइलें हैं।

शिक्षा को चित्रों, मॉडल और स्केच और अन्य विजुअल रीप्रेजेनटेशन पर आधारित करके डिजाइन करने के साथ-साथ स्कूल ऑडियो विजुअल माध्यमों से प्रभावशाली छवि तैयार कर सकता है जो कक्षाओं में लिख और बोलकर पढ़ाने के मुकाबले बेहतर माने जाते हैं। इस तरह की डिगीबोर्ड कक्षाएं पूछताछ, खोज और आईडिया के गठजोड़ का केंद्र होती हैं। उदाहरण के लिए, डिगीक्लास ऐसा ही एक प्रौद्योगिकीय औजार है जो डायग्राम और चित्रों के जरिए जटिल अवधारणाओं को आसान बना सकता है, बेहतर समझ मुहैया करा सकता है और इस तरह पढ़ना ज्यादा दिलचस्प हो सकता है। क्लास में आने से पहले छात्र संक्षिप्त वीडियो पाठ देख सकते हैं और प्रोजेक्टपर काम कर सकते हैं, चर्चा कर सकते हैं और कई अन्य संभावनाओं को टटोल सकते हैं। इससे परंपरागत कक्षाएं अंतरसक्रिय लर्निंग केंद्र में बदल जाती है। भारत में ज्यादा स्कूल धीरे-धीरे ऐसे तकनीक अपना रहे हैं जो सीखने के ज्ञानात्मक रुख पर आधारित हैं। शिक्षकों की बच्चों से रोज जो चर्चा होती है वह सबसे महत्त्वपूर्ण है और बच्चे पर इसका बड़ा और लंबे समय तक बना रहने वाला प्रभाव पड़ता है। इसलिए, स्कूल की पढ़ाई का मतलब सिर्फ औपचारिक शिक्षा नहीं होना चाहिए।

अनौपचारिक शिक्षा जैसे स्कूल के बाहर भी पढ़ाई को भी समझा, जाना और उपयोग में लाया जाना चाहिए। स्कूलों को अनुभव वाले या रचनात्मक लर्निंग प्रोगाम पर फोकस करना चाहिए जो अभिनव, स्व प्रेरक स्वयं सीखने वाले हैं और छात्रों को इस योग्य बनाते हैं कि वे सोच सकें और स्थितियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कर सकें। शैक्षिक व्यवहार जैसे डू ईट योरसेल्फ किट्स और एजुकेशन टुअर्स ना सिर्फ छात्रों को जटिल विषयों को आसान करने में सहायता करता है बल्कि उन्हें शक्ति देता है कि विश्व के प्रति अपने नजरिए को आकार दे सकें।

शिक्षक अपनी गतिविधियों की योजना बना सकते हैं जो सीखने वालों को आगे बढ़ने पर सहयता दें। और यह सिर्फ शिक्षा की दृष्टि से आगे बढ़ने के लिए नहीं है बल्कि सामाजिक तौर पर और भावनात्मक रूप से भी। शिक्षा देने वाले जब भावनात्मक और सामाजिक विकास को नजरअंदाज करते हैं तो अक्सर ऐसे वयस्क तैयार होते हैं जो शिक्षा की दृष्टि से भले ही काबिल हों पर अपने दैनिक जीवन में संघर्ष करते हैं क्योंकि उनमें आत्म सम्मान या सामाजिक कौशल की कमी होती है। शिक्षा के साथ-साथ बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए स्कूलों को चाहिए कि बच्चों को जीवन के आवश्यक कौशलों से लैस करें। इनमें समस्याएं दूर करने, कारण बताने, रणनीति बनाने, विश्लेषण करने आदि ऐसे कौशल हैं जो बच्चे के वयस्क जीवन में निजी या पेशेवर मामलों में उपयोगी साबित होते हैं। छात्रों को अपने शौक के अनुसार काम करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए और उन्हें जीवन भर की सीख के महत्त्व को विकसित करना चाहिए। शौक से चलने वाले और दिलचस्पी पर आधारित प्रेरणा से बच्चे को बड़े होने पर सहायता मिलेगी।

शिक्षा में खेल का महत्त्व एक और पहलू है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। छात्र अगर खेल-कूद में हिस्सा न लें या कम लें तो ना सिर्फ उनकी शारीरिक फिटनेस प्रभावित होती है बल्कि व्यक्ति के रूप में उनका संपूर्ण विकास भी प्रभावित होता है। स्कूल स्पोर्ट्स और फिजिकल एजुकेशन कंपनी एडुस्पोर्ट्स द्वारा किए गए छठे वार्षिक स्वास्थ्य और फिटनेस सर्वे के मुताबिक, भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और शहरों के छात्रों के बीच फिटनेस मानक से कुछ चिन्ताजनक आंकड़ों का खुलासा होता है। यह अध्ययन 2015 में किया गया था और इससे पता चलता है कि स्वस्थ बीएमआई की गंभीर कमी है, शरीर के ऊपरी और निचले हिस्से में पर्याप्त शक्ति नहीं है और छात्रों के बीच बर्दाश्त करने की या झेलने की क्षमता भी कम है। युवा मस्तिष्क को शिक्षित करने में खेलों की अहम भूमिका होती है क्योंकि यह अपने साथ एक अच्छे मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के विकास की योग्यता हासिल करता है। यह छात्रों में मजबूत मानसिक संतुलन विकसित करने और अपनी गतिविधियों पर केंद्रित रहने में सहायता करता है। बहुआयामी शिक्षा मुहैया कराने के लिए भारत में स्कूलों को चाहिए कि एक सोची-समझी खेल योजना लागू करें ताकि बच्चों का फिटनेस स्तर बेहतर हो।

स्कूल में पढ़ाई का मतलब सीखने वाले की आजादी का विस्तार होना चाहिए। स्कूल में पढ़ने के अनुभव को बेहतर या समृद्ध करने के लिए जरूरी नहीं है कि बदलाव किया जाए या अभिनव सोच हो। इसके लिए बदलाव और अभिनव सोच की जरूरत होती है। अनुभव को बेहतर और समृद्ध करने के लिए हमें नई टेक्नालॉजी को अपनाने की जरूरत है। कोई प्रीमियम न देने वाले पढ़ाने के परंपरागत तरीके से     संपूर्ण विकास करने वाली शिक्षा की ओर केंद्रित होना सीखने का अर्थपूर्ण अनुभव तैयार करने के लिए आवश्यक है। ऐसे पाठ्यक्रम तैयार करना जो छात्रों के विविध हितों की पूर्ति करें, आकलन का ऐसा ढांचा तैयार करना जो छात्रों के प्रदर्शन से संबंधित मुद्दों को संबोधित करे, छात्रों और अभिभावकों के बीच संचार के खुले चैनल का निर्माण करे  कुछ ऐसे तरीके हैं जिससे हम स्कूल में पढ़ाई के तरीके बदल सकते हैं। प्रशिक्षण के जरिए शिक्षकों को भी आवश्यक सुविधा से लैस करना जरूरी है। सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि समाज के रूप में हमें उच्च स्तर की जिम्मेदारी लेनी चाहिए क्योंकि शिक्षा के बाद छात्रों जो नागरिक बनते हैं उसके लिए हम सब सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं। अगर इस प्रक्रिया से जुड़े सभी प्रमुख स्टेकधारक शिक्षा की डिलीवरी बेहतर करना जारी रखें तो हम बेहतर और अच्छा कल देखने के लिए आवश्वस्त हो सकते हैं।

सुश्री शारा शर्मा, प्राचार्य,पीयरसन स्कूल, जयपुर )