शरद पंवार ने साधे एक तीर से कई निशाने: बेटी सुप्रिया के लिए अजीत को रास्ते से हटाया

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मधुप्रकाश लड्ढा 

महाराष्ट्र (Maharashtar) का हाईवोल्टेज ड्रामा एक बार तो खत्म हो गया। बहुत से सस्पेंस सुलझ गए तो बहुत से अनसुलझे रह गए। भाजपा और शिवसेना की 30 वर्षों की दोस्ती को अमावस्या का लम्बा ग्रहण लग गया। राजनीतिक-दोस्ती में कड़वाहट तो आती रहती है लेकिन समय समय पर उसे त्याग और समर्पण की आहुतियां देकर वापस मजबूत भी बना लिया जाता है। लेकिन इस बार अमावस्या की काली रात का ग्रहण शायद कुछ लम्बा ही होगा। शुरू में तो लग रहा था की भाजपा और शिवसेना का यह विवाद मिलबेठकर सुलझा लिया जाएगा लेकिन सियासी गलियारे पर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठी कांग्रेस की राजमाता को भाइयों की इस लड़ाई में कुछ और ही नजर आने लगा। 

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सोनिया गांधी के कृत्य ने देश को एक बार फिर विदेशी शासन की याद दिला दी कि किस तरह से अंग्रेज ‘फुट डालो और राज करो’ कि नीति को अपनाते थे। सोनिया गांधी ने मराठा क्षत्रप शरद पंवार के माध्यम से शिवसेना के संजय राउत को साधे रखा और संजय राउत ने मीडिया के माध्यम और अपने अनर्गल बयानों से भाजपा और शिवसेना में इतनी पर्याप्त खाई पैदा करदी की बातचीत के सारे रास्ते बंद हो गए। राउत ने अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए ठाकरे परिवार को बेवकूफ बनाया और शिवसेना के हिंदुवादी विचारों की आहुति दे दी। गौरतलब है कि फड़णवीस के मुख्यमंत्री रहते राउत की कुछ भी चलना मुश्किल था।दूसरी और शरद पंवार भी इसी मोके की तलाश में थे।

उन्होंने अपनी कूटनीतिक क्षमता का परिचय देते हुए एक तीर से कई निशाने साध लिए। शरद पंवार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 40 मिनट तक मुलाकात करके एक तरफ कांग्रेस को उलझाए रखा तो दूसरी तरफ शिवसेना की हेंकड़ी को ठंडा कर दिया और इन दोनों की आड़ में अपने गुप्त एजेंडे को अंजाम दे दिया। शरद पंवार की कूटनीतिक शतरंजी चाल में अजीत पंवार प्यादे की तरह बुरी तरह फसकर पिट गए। शरद पंवार ने जबरदस्त गेम खेला और अजित पंवार को जानबूझ कर सरकार में शामिल होने का मौका दिया। काका भतीजे की कड़वाहट को काका ने पहले ही भांप लिया था। उन्हें मालूम था कि अजीत में भी वही आनुवांशिकी गुण है जो मुझमें है, इसलिए मोके का इंतजार कर रहे अजीत को जानबूझ कर सियासी थाल परोसा और अजीत इस चाल में फस गए। 

शरद पंवार चाहते थे कि भविष्य में एनसीपी की बागडोर उनकी पुत्री सुप्रिया सुले के हाथ में रहे। इसके लिए शरद पंवार ने अनजान रहते हुए अजीत को अपना काम करने दिया जैसे उन्हें कुछ मालूम ही नहीं हो। अजीत पंवार ने जिस क्षण डिप्टी सीएम की शपथ ली उसी क्षण से एनसीपी का भविष्य सुप्रिया सुले के हाथों में जाना सुनिश्चित हो गया था। अब इसमें कोई दो मत नहीं है कि भविष्य में एनसीपी का चीफ कौन होगा..!! निश्चित ही सुप्रिया सुले होगी। बाद में परिवार की मदद से अजीत पंवार को वापस पार्टी में ले आये ताकि पार्टी में फूट नहीं पड़े। शरद पंवार ने बहुत ही अच्छे तरीके से अपनी राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी अपनी बेटी को बना दिया और किसी को भनक भी नहीं लगने दी।

अगर शरद पंवार स्वयं भाजपा से समझौता करते तो अजीत का सरकार में महत्वपूर्ण किरदार होता जो सुप्रिया कि राह में बाधा पैदा करता। महाराष्ट्र के इस दिल दुखाने वाले घटना क्रम में सभी दलों को कुछ न कुछ मिला ही है। मलाई हो या बदनामी सभी ने कुछ न कुछ पाया ही है। सबसे ज्यादा अगर किसी का नुकसान हुआ है तो वो है हिदुत्ववादी विचारधारा का। जिसने अपना विश्वास खोया, अपना वोट खोया, अपना स्वाभिमान खोया। सत्ता के लोभ में सबने इसको ठगा है, लुटा है। शिवसेना ने जो किया क्या वह सही है ? बालासाहेब ठाकरे चाहते तो वो स्वयं भी मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन वो हमेशा किंगमेकर की भूमिका में ही रहे। जिसको वो चाहते थे वही मुख्यमंत्री बनता था।

फिर उद्धव ठाकरे ने उस विदेह को क्यों मोहरा बनाया ? पिता की पवित्र आत्मा के नाम पर पुत्र का झूठ बोलना महापाप है। सपने उनके पूरे किए जाते हैं जो सक्षम न हो। बालासाहेब खुद सक्षम थे और उनका ऐसा कोई सपना था ही नहीं, न ही उन्होंने कभी इसका जिक्र किया। उस महान  आत्मा के नाम पर उद्धव ठाकरे ने स्वयं का सपना पूरा किया है। उद्धव ठाकरे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा ने उस विराट पुरुष को बोना सिद्ध कर दिया। उनके हिंदुत्ववादी सिद्धांतों को अग्निदेव को समर्पित कर दिया। यह दिन देखना न पड़े शायद इसीलिए बालासाहेब ठाकरे ने वर्षों पहले अपनी देह त्याग दी थी। उद्धव ठाकरे…कल महाराष्ट्र के सीएम बनने जा रहे हैं उन्हें बधाई….लेकिन याद रहे..आपने अब तक जो कुछ भी समेटा है वो सब साहेब की विरासत थी। इस विरासत को अब औरधूल धूसरित मत होने देना। विदेशियों के हाथ की कठपुतली बनकर इस देश की मिट्टी से समझौता मत करना। ऐसा करने से पहले ही घर लौट आना। हम आपको फिर गले लगा लेंगे।(जय हिंद जय भारत)

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