शिवाजी पार्क में हिंदुत्व की हार : बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों, मोहब्बतों के दिये जला के…

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✍मधुप्रकाश लड्ढा

भारतीय जनता पार्टी (BJP)और शिवसेना (ShivSena) के बीच पिछले 30 वर्षों से चला आ रहा नाता कल पूरी तरह से विच्छेद हो गया। लिव इन रिलेशनशिप जैसे निजी सम्बन्धों की विच्छेदन प्रक्रिया में सिर्फ दो व्यक्तियों को दूर होना होता है लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में सम्बंध विच्छेद की प्रक्रिया में कइयों का दिल तार तार होता है तो कइयों का मन विचलित होता है। कुछ ऐसी ही परिस्थितियोँ से दो चार हाथ होना पड़ रहा है भाजपा और शिवसेना के बहुत से पुराने और नए कार्यकर्ताओं को।


लखनवी अंदाज की तरह पहले आप पहले आप की जगह, मेरा मुख्यमंत्री मेरा मुख्यमंत्री की रट ने हिंदुत्व के उभरते चमन को पल भर में ही उजाड़ दिया।
शादियों में होने वाली बेमेल जोड़ियों के पाणीग्रहण को तो हम अक्सर देखते ही हैं, कल शिवाजी पार्क में बेमेल पार्टियों के शपथ ग्रहण समारोह को भी देखा। दूल्हे को देखा और दूल्हे की बारात में शामिल बारातियों को भी देखा लेकिन दुल्हन के मां गायब दिखी। सोनिया गांधी को यह शादी कम पसन्द आयी शायद इसलिए आशीर्वाद देने के लिए भी नहीं आयी, नहीं आने का कारण तो एक ही लगता है कि सोनिया आंटी तो शिवसेना से सिर्फ लिव इन रिलेशनशिप ही चाहती थी यानी कि बाहर से समर्थन देना।
आशीर्वाद समारोह में कई छोटे मोटे सगे सम्बन्धी भी नदारद दिखे। ममता दीदी, राहुल बावा, अखिलेश भैया, भुआ मायावती भी नदारद थी। दादु केजरीवाल को तो खांसी की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने मना कर दिया होगा कि भाई शिवाजी पार्क में राष्ट्रवादियों को कहीं इंफेक्शन नहीं हो जाए इसलिए शिरकत नहीं करे। अजित दादा बिचारे गुमसुम नजर आए तो सुप्रिया बहन और आदित्य ठाकरे ने मेहमानों की मेहमान नवाजी में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। शरद पंवार तो बेटी सुप्रिया को देख देखकर ही प्रसन्न हो रहे थे।
खेर… सात फेरों का कार्यक्रम महामहिम के मंत्रोचार के बीच सानन्द सम्पन्न हुआ लेकिन शिवजी पार्क में इन सबके बीच में एक चेहरा ऐसा भी था जो टूटे दिल और लुटे अरमानों के साथ अपनो को पराया होते देख रहा था। चार दिन पहले राज भवन में फेरे खाने वाले दूल्हे देवेंद्र फडणवीस को दुल्हन का साथ नहीं मिला। घर से भाग कर आई नई नवेली को ससुराल वाले वापस मना कर ले गए। इसीलिए घर के बड़े बूढ़े लोग रिश्ते बनाने से पहले घर परिवार और खानदान को भी तरहीज देते हैं।
अति उत्साह में भूल गए कि राजनीति में कुछ भी होना सम्भव है। उनके प्रति जो सहानुभूति जनता में उपजी थी, उसको कायम नहीं रख पाए। अघाड़ी पार्टी की गाड़ी कितने दिन चलेगी….. कहना मुश्किल है। चार दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात..
आशीर्वाद समारोह में देवेंद्र बाबू फड़णवीस और उद्धव बाबू ठाकरे दोनों का चेहरा और बॉडी लैंग्वेज देखी तो मुझे फ़िल्म ‘शगुन’ की नायिका वहीदा रहमान पर फिल्माया गीत याद आ गया। सुमन कल्याणपुर के गाये इस गीत के बोल पर नायिका के चेहरे के भाव और इनके चेहरे के भाव एक जैसे लगे। गाने के कुछ बोल लिख रहा हूँ आप भी सुनिए और देखिए…
बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों
मोहब्बतों के दिए जला के
मेंरी वफ़ा ने उजाड़ दी हैं
उम्मीद की बस्तियाँ बसा के
तुझे भुला देंगे अपने दिल से
ये फ़ैसला तो किया है लेकिन
न दिल को मालूम है न हम को
जिएँगे कैसे तुझे भुला के…..।।
हमने महसूस किया है बेबसी और लाचारी के भाव लिए दो भाइयों के बिछड़ने के आलम को। अमावस्या के बाद पूर्णिमा को आने में पंद्रह दिन का समय लगता है। उम्मीद पर दुनियां कायम है, यह रात और दिन का खेल तो चलता ही रहेगा। विश्वास है …फिर सुबह होगी…।।
लेकिन यक्ष प्रश्न यह है कि इस फेरा, फेरी के फेर में जो नुकसान शिव सेना की हिंदुत्व वाली छवि का हुआ है उसकी भरपाई कैसे होगी ?
(क्रमशः)
जयहिंद

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