भगवान महावीर का दर्शन

– शरद केवलिया
भगवान महावीर का दर्शन अहिंसा व समता का दर्शन ही नही, क्रान्ति का दर्शन भी है। महावीर के दर्शन में विश्वास रखने वाला व्य€ित प्राणिमात्र के प्रति एकत्व की अनुभूति सहज रूप से कर लेता है। महावीर वह होता है, जिसने अपने आप को जीत लिया हो। आचार्य तुलसी कहते हैं- महावीर से बढक़र निष्काम कर्म की दूसरी मिसाल नहीं हो सकती। वे आज भी इसीलिए जीवंत हैं €योंकि उनके उपदेशों में जीवन की अहम् समस्याओं का समाधान है। उनकी अहिंसा में विषमता के लिए कहीं स्थान नहीं है। आचार्य महाप्रज्ञ के अनुसार – भगवान महावीर आत्म-साक्षात्कार के महान् प्रवर्तक थे। आत्म-साक्षात्कार अर्थात् सत्य का साक्षात्कार। महावीर ने कहा कि दु:ख का पार वही पा सकता है जो कामना को जानता है और उसे छोडऩा भी जानता है। वैर का पार वही पा सकता है जो वैर के परिणाम को जानता है और उसे छोडऩा भी जानता है।
भगवान महावीर ने कहा था- क्षमा से क्रोध का हनन करें, मार्दव से मान को जीतें, आर्जव से माया को और संतोष से लोभ को जीतें। अहिंसा के समान कोई धर्म नहीं है। वे कहते हैं – मनुष्यों ! सतत् जागृत् रहो। जो जागता है, उसकी बुद्घि बढ़ती है। मनुष्य ज्ञान से जीवादि पदार्थों को जानता है, दर्शन से उनका श्रद्घान करता है, चारित्र से निरोध करता है और तप से विशुद्घ होता है। वे कहते हैं कि जो जीव आत्मा को शुद्घ जानता है वही शुद्घ आत्मा को प्राप्त करता है। मद्यपान से मनुष्य मदहोश होकर निन्दनीय कर्म करता है और फलस्वरूप इस लोक तथा परलोक में अनंत दुखों का अनुभव करता है। अत्यंत तिरस्कृत समर्थ शत्रु भी उतनी हानि नहीं पहुंचाता, जितनी हानि अनिगृहीत राग और द्वेष पहुंचाते हैं।
महावीर का चिंतन अनुभूतिपूर्ण सत्य पर आधारित है, जिसका उन्होंने स्वयं साक्षात्कार कर प्रतिपादन किया। महावीर ने जहां एक तरफ प्राण व पर्याप्तियों के संयम को स्वास्थ्य का आधार कहा, वहीं दूसरी तरफ अशुभ कर्मों व आश्रवों से बचने की स्पष्ट प्रेरणा भी दी। आचार्य तुलसी कहते हैं-मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भगवान महावीर के उपदेश पर जिस दिन अमल होगा, उस दिन एक नये युग का उदय हो सकेगा, नई सृष्टि का सृजन हो सकेगा।
( सहायक जनसम्पर्क अधिकारी, सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय, बीकानेर )