राजस्थानी उपन्यासों में अभी और बहुत गंभीर काम करने की जरूरत : वरिष्ठ साहित्यकार

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श्रीगंगानगर/रायसिंहनगर। राजस्थानी के वरिष्ठ साहित्यकार रामस्वरूप किसान ने कहा है कि लेखन अनायास होता है, जो स्वतः ही चलता रहता है। इसके लिए लेखक को कोई उद्देश्य लेकर नहीं लिखना होता। कोई विचारधारा भी नहीं अपनानी पड़ती।  रचना अपना चिंतन खुद तय करती है। उसी में से विचार निकलता है। वे यहां होटल ब्लैक पैंथर में साहित्य अकादेमी और महर्षि दयानंद कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में आयोजित अंतिम सत्र की अध्यक्षता करते हुए संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि राजस्थानी भाषा में उपन्यासों की संख्या में कम है, यह चिंता वक्ताओं ने जताई है पर तुलनात्मक रूप से हम कितने आगे बढ़े हैं इस पर भी चिंतन जरूरी है। उपन्यास क्या है, यह वास्तव में पश्चिम की विधा है। राजस्थानी उपन्यासों में अभी और बहुत गंभीर काम करने की जरूरत है।

 इस सत्र में दो दशक के राजस्थानी उपन्यासों में नारी विमर्श विषय पर पत्र वाचन करते हुए बीकानेर से आई साहित्यकार सीमा भाटी ने कहा कि राजस्थानी भाषा में उपन्यास कम हैं,  लेकिन बहुत ज्यादा किस विधा में लिखा गया है, इस पर भी हमें सोचना चाहिए। उन्होंने कहा कि नारी विमर्श के लिए लेखक का नारी होना जरूरी नहीं है। कोई पुरुष लेखक भी नारी की पीड़ा को बेहतर तरीके से स्वर दे सकता है।

 राजस्थानी उपन्यासों में दलित विमर्श पर पत्र वाचन करते हुए कृष्ण कुमार आशु ने माना कि राजस्थान में सामंती व्यवस्था लागू रही है। छुआछूत और भेदभाव का बहुत बोलबाला रहा है।आज भी हम इससे ऊपर नहीं उठ पाए हैं। शायद यही कारण है कि हम दलित विमर्श पर राजस्थानी में उपन्यास ज्यादा नहीं दे पाए हैं। शायद हम लोग अपने पुरखों से हुई गलतियों कोसमाज के सामने प्रकट करने का हौसला नहीं दिखा पा रहे हैं। तीसरे पत्रवाचन में दो दशक के राजस्थानी उपन्यासों में सामाजिक राजनीतिक चेतना का जिक्र करते हुए पूरण शर्मा पूरण ने कहा कि उपन्यास का संबंध यथार्थ से है, आदर्श के हवा हवाई से नहीं। दुनिया यथार्थवादी है। लोगों का जीवन सबके सामने है। किसी से छुपा नहीं है। उपन्यास के पात्र अपने भीतर किसी चिंगारी की भांति सुलग रहे होते हैं, जो किसी घटना से जरा सी हवा मिलने पर भड़क उठते हैं।

इस सत्र का संचालन सत्यपाल जोइया ने किया। श्रीमती किरणबाद ने आभार व्यक्त किया।

इससे पहले सुबह कार्यक्रम का उद्घाटन दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस सत्र में कार्यक्रम अध्यक्ष देवकिशन राजपुरोहित थे। बीज वक्तव्य साहित्य अकादमी के राजस्थानी परामर्श मंडल केसंयोजक मधु आचार्य ने दिया। उन्होंने कहा कि जब तक हम आलोचना नहीं कर सकते, तब तक दुनिया को यह नहीं बता पाएंगे कि राजस्थानी साहित्य में क्या कुछ रचा जा रहा है । उन्होंनेमाना कि पिछली सदी तक राजस्थानी के मात्र 125 उपन्यास लिखे गए लेकिन नई सदी में यानी पिछले दो दशक में राजस्थानी के 66  और उपन्यास  हमारे सामने आए हैं।

साहित्य अकादेमी के सहायक संपादक ज्योतिकृष्ण ने अकादमी की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। संचालन मंगत बादल ने किया।

पहले सत्र में सत्यनारायण सोनी ने आधुनिक बोध विषय पर पत्र वाचन करते हुए माना कि राजस्थानी का कथा साहित्य लोक साहित्य है लेकिन आधुनिक युग में भाषा शिल्प की दृष्टि सेराजस्थानी उपन्यास में बहुत महत्वपूर्ण काम हुआ है। इस दौरान अंधविश्वास, रूढ़ियों और कुरीतियों पर भी प्रहार किया गया है। दो दशक के राजस्थानी उपन्यासों में कथ्य और शिल्प विषय पर बोलते हुए नीरज दइया ने कहा कि आज के राजस्थानी उपन्यासों में घर परिवार कामकाज के परिदृश्य प्रमुखता से उठाए गए हैं। आज के उपन्यास में वर्तमान परिवेश की बात को प्रमुखतासे उजागर किया गया है। राजस्थानी उपन्यासों में कथा का विस्तार भाषा और शिल्प के आधार पर प्रभावी तरीके से हमें देखने को मिलता है। दो दशक के उपन्यासों में सांस्कृतिक चेतना विषयपर मंगत बादल ने कहा कि संस्कृति एक बहती हुई नदी है । अपनी संस्कृति का मूल आधार है भाईचारा, प्रेम, सद्भाव और त्याग। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि अब छोटे छोटे बच्चों के हाथों में मोबाइल देख कर डर लगने लगा है कि कहीं हमारी संस्कृति बदरंग नहीं हो जाए ।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक भूपेंद्र सिंह ने कहा कि दो दशक से पहले राजस्थानी उपन्यास बहुत कम थे।  शुरुआती उपन्यासों में आदर्शवादी और सुधारवादी प्रवृत्ति देखने कोमिलती है। आंचलिकता यहां के उपन्यासों में प्रमुखता से है। आधुनिक युग की चेतना स्पष्ट परिलक्षित होती है प्रबंध समिति के पदाधिकारी राजेंद्र सिंह गोदारा ने आभार व्यक्त किया इस सत्र का संचालन हरीश बी शर्मा ने किया।

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