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भौम प्रदोष व्रत से मिलेगी ऋण से मुक्ति, जाने कैसे

भौम प्रदोष व्रत से मिलेगी ऋण से मुक्ति, जाने कैसे

भौम प्रदोष व्रत : 29 सितम्बर, मंगलवार को

भगवान शिवजी की आराधना से मिलती है सुख-समृद्धि, खुशहाली

— ज्योतिषविद् विमल जैन

भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में तैंतीस कोटि देवी-देवताओं में भगवान शिवजी ही देवाधिदेव महादेव की उपमा से अलंकृत हैं। भगवान शिव की पूजा-अर्चना हर आस्थावान धर्मावलम्बी अपनी मनोकामना की पूॢत एवं पुण्य अर्जित करने के लिए करते हैं। शिवजी की कृपा से जीवन में सुख-समृद्धि, वैभव एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए शिवपुराण में विविध व्रतों का उल्लेख है, जिनमें प्रदोष व्रत प्रमुख है। प्रदोष व्रत मास के दोनों पक्षों की प्रदोष व्यापिनी त्रयोदशी तिथि के दिन रखा जाता है। सूर्यास्त की समाप्ति एवं रात्रि के प्रारम्भ में पडऩे वाली त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत के उपास्य देवता भगवान आशुतोष हैं। यह व्रत महिलाएँ एवं पुरुष दोनों के लिए मान्य तथा समानरूप से पुण्य फलदायी है। सायंकाल प्रदोषकाल में भगवान् शिव की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने का विधान है।

प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार यह प्रदोष व्रत 29 सितम्बर, मंगलवार को रखा जाएगा। अधिक आश्विन शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 28 सितम्बर, सोमवार की रात्रि 8 बजकर 59 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन 29 सितम्बर, बुधवार को रात्रि में 10 बजकर 34 मिनट तक रहेगी। 29 सितम्बर, बुधवार को सायं वेला प्रदोषकाल में त्रयोदशी तिथि का मान को रहेगा जिसके फलस्वरूप प्रदोष व्रत इसी दिन रखा जाएगा। व्रतकर्ता को प्रात:काल से निराहार व निराजल रहकर सायंकाल प्रदोषकाल में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। प्रदोषकाल का समय 2 घड़ी या 3 घड़ी का माना गया है। एक घड़ी का समय 24 मिनट का रहता है। सायंकाल सूर्य अस्त होने के पूर्व स्नान करके स्वच्छ व धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके प्रदोष बेला में भगवान शिवजी की पूजा-अर्चना आरम्भ करनी चाहिए।

हर दिन के व्रत का है अलग-अलग प्रभाव—ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि प्रत्येक दिन-वार के प्रदोष व्रत का अलग-अलग प्रभाव है। जैसे—रवि प्रदोष-आयु एवं आरोग्य लाभ, सोम प्रदोष-शान्ति एवं रक्षा, भौम प्रदोष-कर्ज से मुक्ति, बुध प्रदोष-मनोकामना की पूॢत, गुरु प्रदोष-विजय प्राप्ति, शुक्र प्रदोष-आरोग्य, सौभाग्य एवं मनोकामना की पूत, शनि प्रदोष-पुत्र सुख की प्राप्ति। अभीष्ट की पूत के लिए 11 प्रदोष व्रत या वर्ष के समस्त त्रयोदशी तिथियों का व्रत अथवा मनोकामना पूत होने तक प्रदोष व्रत रखने का विधान है।

प्रदोष व्रत का विधान—ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि व्रतकर्ता को प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर स्नान-ध्यान, पूजा-अर्चना के पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लेना चाहिए। दिनभर निराहार रहना चाहिए। सायंकाल पुन: स्नान करके प्रदोष काल में भगवान शिवजी की विधि-विधान पूर्वक पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए। यथासम्भव स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा की जाती है। भगवान शिवजी का अभिषेक करके उन्हें वस्त्र, यज्ञोपवीत, आभूषण, सुगन्धित द्रव्य के साथ बेलपत्र, कनेर, धतूरा, मदार, ऋतुपुष्प, नैवेद्य आदि अॢपत करके धूप-दीप के साथ पूजा-अर्चना करनी चाहिए। शिवजी की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए प्रदोष स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। शिवजी की महिमा में प्रदोष व्रत से सम्बन्धित कथाएँ सुननी चाहिए। प्रदोष व्रत से शिवजी की अपार अनुकम्पा मिलती है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि तो मिलती ही है, साथ ही समस्त दोषों का शमन भी होता है। व्रत के दिन व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए, व्यर्थ के वार्तालाप व परनिन्दा से बचना चाहिए। श्रद्धा-भक्तिभाव के साथ किए गए प्रदोष व्रत से जीवन में सुख सौभाग्य के साथ ही भोलेनाथ की कृपा से जीवन में उन्नति के मार्ग का सुयोग बनता रहता है।


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