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ध्यान चंद को भारत रत्न मिलना चाहिए : ओलंपियन हरबिंदर (आईएएनएस स्पेशल)

ध्यान चंद को भारत रत्न मिलना चाहिए : ओलंपियन हरबिंदर (आईएएनएस स्पेशल)

नई दिल्ली , 13 जनवरी (आईएएनएस)। पूर्व भारतीय कप्तान हरबिंदर सिंह चिमनी ने कहा है कि हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले पूर्व कप्तान और मेजर ध्यान चंद को निश्चित रूप से देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान-भारत रत्न मिलना चाहिए।

वर्ष 1964 ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता चिमनी ने आईएएनएस से कहा, ध्यान चंद को मरणोपरांत भारत रत्न जरूर मिलना चाहिए। वह अंतरराष्ट्रीय हॉकी में विशेष स्थान बनाने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी थे।

उन्होंने कहा, उन्होंने तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते। मुझे नहीं लगता कि भारत रत्न के लिए उनसे ज्यादा योग्य खिलाड़ी कोई और है।

ध्यान चंद एम्स्टर्डम (1928), लॉस एंजेलिस (1932) और बर्लिन (जहां वे कप्तान थे) में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने वाली टीम का हिस्सा थे। 1948 में अंतर्राष्ट्रीय हॉकी को अलविदा कहने वाले ध्यान चंद ने कई मैच खेले और सैकड़ों गोल किए थे।

2014 में दिग्गज भारतीय बल्लेबाज सचिन तेंदुलकर भारत रत्न से सम्मानित होने वाले पहले और एकमात्र खिलाड़ी थे। हालांकि इससे पहले भी, ध्यान चंद को देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित करने की मांग उठ चुकी है।

साल 1968 और 1972 के ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहे चिमनी ने ध्यान चंद को भारत रत्न से सम्मानित करने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव डालने के अपने प्रयासों की ओर इशारा किया।

उन्होंने कहा, हम पिछले कुछ समय से सरकारों से अनुरोध कर रहे हैं। लेकिन मुझे नहीं पता कि सरकारें हमारे अनुरोधों पर ध्यान क्यों नहीं दे रही हैं। मुझे याद है कि तेंदुलकर को सम्मानित करने के बाद मैं, जफर इकबाल और कई अन्य पूर्व हॉकी खिलाड़ियों ने दिल्ली में जंतर-मंतर पर बाराखंभा रोड क्रॉसिंग पर महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा से एक जुलूस निकाला था, जहां हम सरकार को याद दिलाने के लिए बस कुछ समय के लिए बैठे थे।

ध्यान चंद को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की संभावना के बारे में पूछे जाने पर चिमनी ने कहा मुझे नहीं पता। यह सब सरकार, उनके मानदंड और उनकी विचार प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

देश में हर साल 29 अगस्त को उनकी जयंती के अवसर पर उनके सम्मान में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।

सेंटर फॉरवर्ड ध्यान चंद एक निस्वार्थ व्यक्ति और खिलाड़ी थे। मैदान पर, अगर जब उन्हें लगता था कि कोई अन्य खिलाड़ी गोल करने के लिए बेहतर स्थिति में है, तो वह गेंद को अपने पास रखने के बजाय दूसरों को पास कर देते थे।

1936 के बर्लिन ओलंपिक में ब्रिटिश भारतीय सेना के एक प्रमुख ध्यान चंद को देखने के बाद एडोल्फ हिटलर ने उन्हें जर्मन नागरिकता और एक उच्चतर सेना पद देने की पेशकश की थी हालांकि ध्यान चंद ने बड़ी विनम्रता से इसे ठुकरा दिया था।

भारत सरकार ने ध्यान चंद को 1956 में पदम भूषण से सम्मानित किया था। 1980 में दिल्ली के एम्स में उनका निधन हो गया था।

--आईएएनएस

ईजेडए/एएनएम

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