मनोवैज्ञानिक समझाइश से होता है मनोविकार का उपचार

मनोवैज्ञानिक समझाइश से होता है मनोविकार का उपचार 1जयपुर। बच्चे का खोया खोया रहना अथवा गुमसुम रहना ‘ऑटिज्म’ रोग का लक्षण हो सकता है। ऑटिज्म एक प्रकार का मनोविकार है जिसे मनोवैज्ञानिक समझाइश के जरिये उपचारित किया जा सकता है। बच्चे में पहचानने की क्षमता में कमी होना, जवाब न देना, आंख से आंख मिलाकर बात न करना, एकाकीपन जैसे लक्षण ऑटिज्म के हो सकते हैं। ऐसे बच्चों में चलना, बोलना तथा ठीक से समझ पाने की क्षमता देर से विकसित होती है। यह जानकारी मनोचिकित्सक डॉ. मंजू भास्कर ने दी। वे विष्व ऑटिज्म दिवस के अवसर पर महात्मा गांधी अस्पताल में आयोजित कार्यक्रम में श्रोताओ को सम्बोधित कर रहीं थीं।

इस अवसर पर ऑडियो वीजुअल प्रेजेन्टेशन के जरिये ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट डॉ. एस. के. मीना तथा डॉ. प्रज्ञा मिश्रा ने बताया कि देश में प्रति एक हजार में से दो बच्चों में ऑटिज्म के लक्षण पाये जाते हैं। यह रोग लडकियों की अपेक्षा लडकों में चार गुना तक अधिक पाया जाता है। गर्भावस्था के दौरान माता को हुए संक्रमण की वजह से यह विकार जन्म के समय ही प्रभावित बच्चे के साथ जुड जाता है। आम तौर पर दो-तीन माह के बच्चे अपनी मां को पहचानने लगते हैं, हिलते डुलते खिलौनों तथा उनकी आवाजों पर अपना ध्यान केन्द्रित करने लगते हैं, किन्तु ऑटिज्म से प्रभावित बच्चे ऐसा नहीं कर पाते। समय पर उपचार नहीं मिलने पर बच्चे का मानसिक विकास रूक जाता है। इसलिए तीन वर्ष की आयु तक ही बच्चे के मानसिक स्तर को पहचाना जाना चाहिए। जिससे उसे क्लिनिकल साइकोलोजिस्ट तथा ऑक्यूपेशनल मनोवैज्ञानिक समझाइश से होता है मनोविकार का उपचार 2थैरेपिस्ट की मदद से जीवन की मुख्य धारा में जोडा जा सके। उन्होंने बताया कि ऑटिज्म प्रभावित बच्चों की ‘आईक्यू’ यानी बौद्धिक स्तर दूसरे बच्चों के समान ही होता है, परन्तु पढाई, बातचीत के दौरान उनमें एकाग्रता की कमी देखी जाती है। खाने पीने में एक ही प्रकार की चीज, खेलकूद में भी एक ही प्राथमिकता, अपनी आदत से अलग दूसरी चीजों को नजरअंदाज किया जाना भी ऑटिज्म के लक्षण हैं। इस रोग को मनोवैज्ञानिक उपचार व तकनीकों के जरिये ठीक किया जा सकता है। चिकित्सकों ने बताया कि ऑटिज्म प्रभावित बच्चे को उसकी पसंद के अनुरूप ही खेल खेल में, झूला झुलाते हुए। उन्होंने सलाह दी कि माता-पिता तथा साथी ऐसे बच्चों को के साथ जोर जबर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। उनकी पसंद के काम करते हुए काउंसिलिंग तथा उनका सामाजिक मेल-जोल बढाया जाना चाहिए। सामान्य बच्चे की भांति उसकी गतिविधियॉं रखें। देरी से समझ पाने की कमी को बार-बार दोहराकर या खुद के द्वारा किये जाने पर बच्चे को सामान्य बनाया जा सकता है।