लेखक डॉ.सतीश पूनिया (भाजपा हरियाणा प्रदेश प्रभारी एवं राज्यसभा सांसद)
यह 1992 का साल था। पूरे देश में कश्मीर सत्याग्रह का वातावरण बना हुआ था। भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी के नेतृत्व में श्रीनगर के लाल चौक पर ऐतिहासिक रूप से तिरंगा फहराया गया। इस दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के “मार्च” को तत्कालीन सरकार ने लाठी गोली के बल पर रोका,उधमपुर में हमारे कार्यकर्ताओं और छात्रों को गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ महासचिव के नाते अगुवाई करते हुए विश्वविद्यालय के छात्रों एवं विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के साथ जयपुर में दूरदर्शन केन्द्र पर उग्र प्रदर्शन किया और गिरफ्तारियां दीं।
भारतीय जनता पार्टी के प्रेरणापुंज श्यामा प्रसाद मुखर्जी के संदर्भ उपरोक्त चर्चा इसलिए आवश्यक है कि जम्मू कश्मीर को भारतीय जनता पार्टी की रीति-नीति का हिस्सा बनाने और उस पर कार्य करने के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का विजन और आदर्श पर लगातार कार्य किया जा रहा है।
साल 2019 में जम्मू कश्मीर से धारा 370 और 35 ए को हटाने के बाद से लेकर अब तक जिस तरह जम्मू कश्मीर में विकास के कार्य किये जा रहे हैं, वह जम्मू कश्मीर का भारत के साथ पूरी तरह सांघिकता का श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ही दृष्टिकोण रहा है। उस वक्त हमारे मन में यह दृढता तो थी कि जम्मू-कश्मीर का पूर्ण विलय का ख्बाव पूरा होगा, लेकिन उस वक्त के हालात से वह दूर की कौढ़ी लगता था।
यदि किसी एक विषय ने डॉ. मुखर्जी को राष्ट्रीय स्मृति में स्थायी स्थान दिलाया, तो वह था जम्मू-कश्मीर का प्रश्न। उन्होंने उस व्यवस्था का विरोध किया जिसमें एक ही देश में अलग संविधान, अलग झंडा और अलग प्रधानमंत्री की व्यवस्था थी। उनका प्रसिद्ध उद्घोष- “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे”-भारतीय राजनीति का स्थायी नारा बन गया।
जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ पूर्ण एकीकरण का प्रश्न जनसंघ की स्थापना से ही पार्टी की प्रमुख वैचारिक प्रतिबद्धता थी और डॉ. मुखर्जी ने इसे अपने सार्वजनिक जीवन का केंद्रीय विषय बनाया।
डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमन्त्री वजीरे-आज़म अर्थात प्रधानमंत्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में डॉ. मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की जोरदार वकालत की।
अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा। उन्होंने तात्कालिन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे।
अपने संकल्प को पूरा करने के लिये वे 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर नज़रबन्द कर लिया गया। 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी।
उनके बलिदान ने पहले जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के भीतर जम्मू कश्मीर की भारत के साथ पूर्ण विलय की भावना को और भी सुदृढ़ कर दिया और इसे भाजपा ने अपनी नीति का अभिन्न हिस्सा बना लिया था।
साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में जम्मू-कश्मीर पर लगा धब्बा अनुच्छेद 370 को संसद ने पूर्ण बहुमत से हमेशा के लिए हटा दिया। आज जिस तेजी से जम्मू-कश्मीर भारत की मुख्यधारा के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा है, वह भाजपा की अपनी वैचारिकी पर अडिग रहने का ही शुभ परिणाम है।
आज जब डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की जयंती पर उनका स्मरण कर रहे हैं, तो उनकी दूरदृष्टि, उनका देश के लिए सोचने का नजरिया, राष्ट्रीय एकता के लिए उनका बलिदान नई पीढ़ी की धमनियों में प्रेरणा बनकर बहती है। कुशल संगठक होने के साथ शिक्षा, उद्योग और राष्ट्रीय एकता के उनके सूत्र हम नई पीढ़ी का वर्तमान में भी मार्गदर्शन कर रहे हैं।
डॉ. मुखर्जी का जन्म 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित शिक्षित परिवार में हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी स्वयं प्रसिद्ध शिक्षाविद् थे। यही कारण था कि शिक्षा, बौद्धिक स्वतंत्रता और राष्ट्रनिर्माण उनके व्यक्तित्व के मूल आधार बने। विलक्षण प्रतिभा के धनी डॉ. मुखर्जी मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उस समय भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देना और शिक्षा को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ना उनके प्रमुख प्रयासों में शामिल था। उन्होंने विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री देने वाली संस्थाओं के बजाय राष्ट्रनिर्माण के केंद्र के रूप में देखा।
स्वतंत्रता के बाद महात्मा गांधी और वल्लभभाई पटेल के अनुरोध पर वे भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में शामिल हुए और उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। इस भूमिका में उनके योगदान की चर्चा अपेक्षाकृत कम हुई है। अनेक विश्लेषकों का मत है कि स्वतंत्र भारत के औद्योगिक ढांचे की प्रारंभिक नींव रखने वालों में उनका महत्वपूर्ण स्थान हैं।
विश्लेषक मानते हैं कि भारत में जिस औद्योगिकीकरण का श्रेय प्रथम प्रधानमंत्री को दिया जाता है, वास्तव में उस श्रेय का असली हकदार डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे। उनके कार्यकाल में सिंदरी उर्वरक संयंत्र, चित्तरंजन लोकोमोटिव वर्क्स और भारी उद्योगों की आधारभूत योजनाओं को गति मिली। उनका मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब भारत आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने। यही सोच आगे चलकर औद्योगिक विकास की आधारशिला बनी।
डॉ.मुखर्जी का व्यक्तित्व केवल प्रशासनिक दक्षता तक सीमित नहीं था। वे सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रहने वाले नेता थे। वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने तत्कालीन सरकार से इस्तीफा दिया। यह निर्णय बताता है कि उनके लिए पद से अधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत थे। उनके राजनीतिक जीवन का यह पक्ष उन्हें उन नेताओं की श्रेणी में रखता है जिन्होंने सत्ता से अधिक विचार को महत्व दिया।
ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को कांग्रेस के नेताओं ने अखंड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया।
1951 में उन्होंने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। उस समय यह केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरा। जनसंघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकीकरण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और मजबूत केंद्र की अवधारणा को राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाया। कम सदस्यों के बावजूद जनसंघ अपनी वैचारिकी के बलवूते भारतीय जनमानस में अपनी पैठ बना रहा था। जनसंघ ने कभी भी अपनी विचारधारा से समझौता नहीं किया।
यही कारण है कि आज भी भारतीय जनता पार्टी अपनी विचारधारा के लिए देश के नागरिकों के बीच ‘पार्टी विद डिफरेंस’ के रूप में विश्वास जीत रही है। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य पश्चिम बंगाल में हाल की पार्टी की जीत इसी का परिणाम है और यह पार्टी की ओर से डॉ. मुखर्जी को एक सच्ची श्रद्धांजलि भी है।













