बीकानेर। राजस्थान की गौरवशाली लोक-संगीत परंपरा मांड गायकी के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से मांड विरासत एवं कला उत्थान संस्थान द्वारा तेजरासर गांव में दो दिवसीय 18,19 जून मांड गायन कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में लगभग 20 से 25 युवक-युवतियों ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर मांड गायन की बारीकियां सीखीं।
संस्थान के संस्थापक एवं पद्मश्री अली गनी ने बताया कि मांड गायकी राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान है, लेकिन बदलते समय के साथ यह लोक विधा धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है। इसे संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से मांड विरासत एवं कला उत्थान संस्थान निरंतर कार्य कर रहा है।
कार्यशाला में प्रतिभागियों को मांड गायन की पारंपरिक शैली, सुर-ताल, प्रस्तुति एवं लोक संगीत की विशेषताओं का प्रशिक्षण दिया गया। युवा प्रतिभागियों ने मांड सीखने में गहरी रुचि दिखाई तथा इस विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया।
पद्मश्री अली गनी ने कहा कि संस्थान का उद्देश्य राजस्थान के गांव-गांव तक पहुंचकर युवाओं को मांड गायकी से जोड़ना है। इसी कड़ी में भविष्य में भी विभिन्न गांवों में मांड गायन कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा, ताकि राजस्थान की इस अनमोल लोक धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सके।
ग्रामीणों एवं कला प्रेमियों ने इस पहल की सराहना करते हुए इसे लोक संस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया। मांड विरासत एवं कला उत्थान संस्थान द्वारा किए जा रहे इन प्रयासों से मांड गायकी को नई पहचान और नई पीढ़ी का साथ मिलने की उम्मीद जगी है।












